अम्मान मंत्री बैठक: यरुशलम में इज़राइली कदमों की निंदा, अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की मांग
अम्मान में अरब देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक ने यरुशलम में इज़राइल की नीतियों की निंदा की और इन्हें रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय प्रयास शुरू करने का ऐलान किया।
मुख्य बिंदु
AIअम्मान में बुधवार को आयोजित बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में अरब देशों के विदेश मंत्रियों ने यरुशलम में इज़राइल की नीतियों और कार्रवाइयों की कड़ी निंदा की, जिनका मकसद शहर की अरब-इस्लामी और ईसाई पहचान को बदलना है। साथ ही, इन नीतियों को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय प्रयास शुरू करने का ऐलान किया गया।
जॉर्डन की सरकारी समाचार एजेंसी 'पेट्रा' के अनुसार, जॉर्डन की पहल पर इस बैठक में जॉर्डन, मिस्र, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, इराक, कतर, सऊदी अरब, सोमालिया, फिलिस्तीन, मोरक्को और अरब लीग के महासचिव के अलावा इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्की और मलेशिया के विदेश मंत्री और प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में यरुशलम और वहां की इस्लामी-ईसाई धार्मिक स्थलों पर इज़राइल के अभूतपूर्व और खतरनाक कदमों पर चर्चा हुई और क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाली सभी अवैध इज़राइली कार्रवाइयों का मिलकर विरोध करने का निर्णय लिया गया।
बैठक में शामिल नेताओं ने यरुशलम की अरब-इस्लामी और ईसाई पहचान, कानूनी और जनसांख्यिकीय स्थिति बदलने की इज़राइली कोशिशों की निंदा की और इन्हें पूरी तरह अवैध, निरर्थक और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। साथ ही, इज़राइल को कब्जाधारी शक्ति के रूप में उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाई गई।
बयान में कहा गया कि पूर्वी यरुशलम फिलिस्तीनी क्षेत्र का हिस्सा है, जिस पर इज़राइल की कोई संप्रभुता नहीं है। यह स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य की राजधानी है, जिसकी स्थापना 4 जून 1967 की सीमाओं के आधार पर, दो-राष्ट्र समाधान और अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों के अनुरूप होनी चाहिए।
बयान में अल-अक्सा मस्जिद/हरम अल-शरीफ में इज़राइली उल्लंघनों और वहां की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति बदलने के सभी प्रयासों की निंदा की गई। इसमें इज़राइली अधिकारियों और कट्टरपंथी यहूदी बस्तियों के निवासियों द्वारा बढ़ती घुसपैठ, नमाजियों की आवाजाही पर पाबंदी और उनके खिलाफ हिंसा की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया।
बयान में दोहराया गया कि अल-अक्सा मस्जिद/हरम अल-शरीफ का पूरा 144 डूनम क्षेत्र केवल मुस्लिमों की इबादत के लिए है और इसकी देखरेख का एकमात्र अधिकार जॉर्डन के इस्लामिक वक्फ मंत्रालय के पास है।
बयान में ईसाई धार्मिक स्थलों के खिलाफ इज़राइली उल्लंघनों, ऐतिहासिक ईसाई उपस्थिति को खतरे, चर्च ऑफ द होली सेपुलचर तक पहुंच पर पाबंदियों, चर्चों के मामलों में हस्तक्षेप, संस्थानों और संपत्तियों पर दबाव, और धार्मिक नेताओं व श्रद्धालुओं पर हमलों की भी निंदा की गई।
बयान में यरुशलम के इस्लामी और ईसाई धार्मिक स्थलों पर ऐतिहासिक हाशमी संरक्षण और उसकी भूमिका की सराहना की गई, साथ ही यरुशलम के निवासियों के संघर्ष और संस्थानों के समर्थन का वादा किया गया।
बयान में यरुशलम समिति और 'बैत माल अल-कुद्स अल-शरीफ' एजेंसी की भूमिका को अहम बताया गया और चेतावनी दी गई कि यरुशलम में धार्मिक स्थलों पर इज़राइली हमले दुनियाभर के लगभग दो अरब मुस्लिमों की भावनाओं को आहत करते हैं और इससे क्षेत्रीय व वैश्विक स्तर पर गंभीर धार्मिक संघर्ष भड़क सकता है।
बयान में अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अपील की गई कि वे यरुशलम और उसके धार्मिक स्थलों में इज़राइल की सभी अवैध कार्रवाइयों को तुरंत रोकने के लिए कदम उठाएं। इसमें बस्तियों के विस्तार, भूमि कब्जे, फिलिस्तीनी अर्थव्यवस्था की घेराबंदी, फिलिस्तीनी संस्थानों को निशाना बनाने, शरणार्थी राहत एजेंसी पर हमलों, गाजा में संघर्ष विराम उल्लंघन और मानवीय संकट को लेकर चिंता जताई गई।
बयान में यरुशलम की कानूनी स्थिति के उल्लंघन के रूप में किसी भी देश द्वारा दूतावास खोलने या स्थानांतरित करने के एकतरफा फैसलों को खारिज किया गया और ऐसे कदमों को अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के खिलाफ बताया गया।
बयान में इज़राइली नीतियों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर प्रभावी रुख के लिए साझा अंतरराष्ट्रीय अभियान शुरू करने, यरुशलम और उसके धार्मिक स्थलों की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति का सम्मान सुनिश्चित कराने, और इज़राइली उल्लंघनों के दस्तावेजीकरण व जागरूकता के लिए स्थायी संस्थागत तंत्र और मीडिया मंच स्थापित करने की घोषणा की गई।
साथ ही, बयान में सितंबर में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सत्र के दौरान इस्लामी सहयोग संगठन और अरब लीग का संयुक्त मंत्री स्तरीय बैठक बुलाने का आह्वान किया गया, जिसमें यरुशलम और उसके धार्मिक स्थलों में इज़राइली कदमों के खिलाफ रणनीति पर चर्चा होगी।
