चार बड़े क्लबों की मिल्कियत ट्रांसफर पर विशेषज्ञ की टिप्पणी
खेल समीक्षक सऊद अल-सरामी ने चार प्रमुख क्लबों की मिल्कियत सार्वजनिक निवेश कोष को सौंपने के समय और कारणों पर सवाल उठाए हैं।
मुख्य बिंदु
AIखेल समीक्षक सऊद अल-सरामी ने सवाल उठाया है कि इस समय चार बड़े क्लब—इत्तिहाद, नसर, हिलाल और अहली—की मिल्कियत खेल मंत्रालय से सार्वजनिक निवेश कोष (PIF) को क्यों सौंपी गई, और क्या यह फैसला फीफा अध्यक्ष जियानी इनफैंटिनो की मौजूदा मुश्किलों के साथ जुड़ा है।
अल-सरामी ने 'अरबिया एफएम' से बातचीत में कहा कि गैर-लाभकारी संस्थाओं के बोर्ड भंग करने संबंधी बयान पर उनकी कुछ टिप्पणियाँ हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि असल में इन बोर्डों का कार्यकाल समाप्त हुआ है, न कि उन्हें भंग किया गया है। साथ ही, उन्होंने बताया कि कई अधिकारी पहले ही अपने पद छोड़ चुके थे।
उन्होंने कहा कि इन चार क्लबों की मिल्कियत PIF को सौंपना, उनके नजरिए में, खेल मंत्रालय की एक स्मार्ट और पेशेवर पहल है। मंत्रालय पर क्लबों पर भारी खर्च को लेकर लगातार आलोचना हो रही थी, ऐसे में मिल्कियत ट्रांसफर से उस पर दबाव कम होगा।
अल-सरामी ने यह भी इशारा किया कि यह कदम सऊदी फुटबॉल महासंघ के चुनावों के इर्द-गिर्द चल रहे विवाद से ध्यान हटाने का जरिया भी हो सकता है, खासकर जब कई उम्मीदवारों की सूची हटाकर सिर्फ एक सूची को चुनाव में रखा गया है।
उन्होंने कहा, "खेल मंत्रालय के 25% हिस्सेदारी संबंधी बयान के बाद, अब इस पर पहले जैसी चर्चा नहीं रही," यानी गैर-लाभकारी संस्थाओं की हिस्सेदारी और क्लबों की गवर्नेंस पर पुराना विवाद अब शांत हो गया है।
अल-सरामी ने समय के चुनाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या सऊदी अरब ने फीफा और इनफैंटिनो की 'कानूनी मुश्किलों' का फायदा उठाकर इस ट्रांसफर की घोषणा की है, खासकर जब फीफा अध्यक्ष को लेकर विवाद चल रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि क्लबों की 25% हिस्सेदारी का प्रावधान पहले इसलिए था ताकि फीफा के नियमों से टकराव न हो, और अब इस हिस्सेदारी को खत्म करने का फैसला क्या अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संस्था में चल रहे घटनाक्रमों से जुड़ा है।
X पर ट्वीट देखें
अल-सरामी ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि ये सारे सवाल विश्लेषण और विचार के तौर पर हैं, और उन्होंने उम्मीद जताई कि इस फैसले के समय को लेकर स्पष्ट जवाब मिलेगा।
