आत्म-आलोचना: कब बनती है प्रेरणा, कब रुकावट?
महा अल-कहतानी के अनुसार, बार-बार खुद को दोष देना सीखने के बजाय मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
मुख्य बिंदु
AIमहा अल-कहतानी, मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर, बताती हैं कि आत्म-आलोचना का मतलब है किसी गलती के लिए खुद को बार-बार दोषी ठहराना, केवल उससे सीखने और सुधार की कोशिश करने तक सीमित न रहना। यह आत्म-मूल्यांकन के विपरीत है, जिसमें व्यक्ति गलती से सीखता है और उसे दोहराने से बचता है।
उन्होंने "सुब्ह सऊदी" कार्यक्रम में कहा कि आत्म-आलोचना की प्रवृत्ति बचपन से शुरू होती है, खासकर तब जब माता-पिता अपने बच्चों की लगातार दूसरों से तुलना करते हैं—चाहे पढ़ाई हो या जीवन की अन्य सफलताएँ। ऐसी तुलना बच्चों पर गहरा असर छोड़ती है और उनकी आत्म-छवि कमजोर कर देती है।
महा अल-कहतानी ने यह भी कहा कि आत्म-आलोचना का सबसे बड़ा नुकसान मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है—व्यक्ति अपनी कमजोरियों पर ही केंद्रित रहता है, अपनी ताकतों को नजरअंदाज करता है और असफलता या आलोचना के डर से नई चीज़ें आज़माने से कतराता है।
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