इस्लामी सभ्यता में अश्वेतों की भूमिका पर किताब का फ्रेंच अनुवाद जारी
किंग अब्दुलअज़ीज़ पब्लिक लाइब्रेरी ने 'इस्लामी सभ्यता में अश्वेतों की भूमिका' पुस्तक का फ्रेंच संस्करण प्रकाशित किया है, जिसमें मुस्लिम अश्वेतों के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित किया गया है।
मुख्य बिंदु
AIरियाद स्थित किंग अब्दुलअज़ीज़ पब्लिक लाइब्रेरी ने शोधकर्ता डॉ. राशिद अल-खैय्यून की किताब 'इस्लामी सभ्यता में अश्वेतों की भूमिका' का फ्रेंच संस्करण प्रकाशित किया है। यह किताब विभिन्न इस्लामी युगों में अश्वेत मुस्लिमों की उपलब्धियों और उनके विज्ञान, कला, साहित्य व संस्कृति में योगदान का परिचय कराती है। पुस्तक मुख्य रूप से इस्लाम के आरंभिक दौर से लेकर बगदाद में अब्बासी काल (656 हिजरी/1258 ईस्वी) के अंत तक के कालखंड पर केंद्रित है। इसमें दासता की अवधारणा, विभिन्न सभ्यताओं में दास प्रथा, और यूरोप व इस्लामी देशों में श्वेत व अश्वेत दासों के व्यापार के अंत की विस्तृत चर्चा भी शामिल है।
फ्रेंच में 403 पृष्ठों की यह किताब अश्वेतों की मानवीय भूमिकाओं का समग्र दस्तावेज़ है, जिसमें उन्हें इस्लामी सभ्यता के सक्रिय सदस्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि रंग और दासता के बीच संवेदनशील संबंध किस तरह समय के साथ विकसित हुए, खासकर खलीफाओं के दौर के बाद।
किताब में प्रमाणित स्रोतों के आधार पर यह दिखाया गया है कि अश्वेतों ने विज्ञान, साहित्य, कविता, सत्ता, कला और अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेखक ने इसके लिए 210 प्राचीन और आधुनिक स्रोतों का सहारा लिया है।
इस किताब का पहला अरबी संस्करण 2015 में प्रकाशित हुआ था, जिसके बाद नवंबर 2023 में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी आया।
रंगों में भिन्नता, श्रेष्ठता नहीं:
किताब में बताया गया है कि इंसानों के रंगों में भिन्नता, जैसा कि कुरान में वर्णित है, केवल एक अंतर है, कोई श्रेष्ठता नहीं। रंगों का फर्क भाषाओं के फर्क की तरह ही है—यह ईश्वर की उन निशानियों में है, जिन पर इंसान को विचार करना चाहिए।
पहले भाग 'दासता और दासों की स्थिति' में चार अध्याय हैं। पहला अध्याय उन स्रोतों की चर्चा करता है, जिन्होंने अश्वेतों का उल्लेख किया है—कुछ केवल उन्हीं पर केंद्रित हैं, जबकि कुछ सामान्य हैं।
दूसरे अध्याय में इस्लाम से पहले अश्वेतों और दासता की स्थिति का अध्ययन है, जिसमें बाबिल से लेकर प्राचीन रोम, यूनान, यूरोपीय युगों और दासता व दास व्यापार को समाप्त करने के आह्वान तक का विवरण है। तीसरा अध्याय इस्लाम में दासता और अश्वेतों के साथ व्यवहार पर केंद्रित है।
चौथा अध्याय बासरा में अश्वेतों के तीन विद्रोहों सहित, उनके सामाजिक आंदोलनों और विद्रोहों का विश्लेषण करता है—पहला और दूसरा विद्रोह पहली हिजरी सदी में और तीसरा तीसरी सदी के मध्य में हुआ।
अश्वेत हस्तियाँ:
दूसरे भाग के छह अध्याय 'अश्वेत हस्तियाँ और उनके जीवनवृत्त' शीर्षक के तहत, मुस्लिम अश्वेतों की प्रमुख हस्तियों की जीवनी और योगदान प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को इन हस्तियों के अपने-अपने क्षेत्रों में किए गए कार्यों से परिचित कराया गया है, और उनके जीवनवृत्त कालक्रमानुसार प्रस्तुत किए गए हैं।
लेखक ने यह भी दिखाया है कि किस तरह अश्वेतों के प्रति समाजों के दृष्टिकोण और दासता की व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास हुआ, और इस्लामी शिक्षाओं और कानूनों ने इस दिशा में अन्य व्यवस्थाओं की तुलना में अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाया।
पाठकों को कई ऐसी विशिष्ट और प्रेरक हस्तियों के बारे में जानकारी मिलती है, जिनकी उपलब्धियों को अक्सर उनकी त्वचा के रंग के कारण नजरअंदाज कर दिया गया। लेखक ने उनके प्रयासों को रेखांकित किया है, जिन्होंने दासता और भेदभाव की भावना को पीछे छोड़कर उच्च स्थान प्राप्त किए।
दूसरे भाग में लेखक ने नबवी, राशिदुन और अब्बासी काल तक की कई प्रमुख अश्वेत हस्तियों का उल्लेख किया है, जैसे: उसामा बिन ज़ैद, बिलाल बिन रबाह, वह्शी बिन हरब अल-हबशी, मह्जा मवला उमर बिन खत्ताब, शक्रान अल-हबशी, मकहूल अल-शामी, सईद बिन जुबैर, अब्दुल्ला बिन खाज़िम अल-सुलमी और अन्य। कवियों में: सलीक बिन अल-सलिका, खफाफ बिन नदबा, अब्दा बिन अल-तबीब, सुहैम अब्द बनी अल-हस्सास, नसीब बिन रबाह आदि।

