किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ने विकसित की ऊर्जा बचाने वाली गैस पृथक्करण तकनीक
किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ने उन्नत झिल्ली तकनीक विकसित की है, जिससे औद्योगिक गैसों के पृथक्करण में ऊर्जा की खपत कम होगी।
मुख्य बिंदु
AIकिंग अब्दुल्ला विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (काओस्ट) ने एक नई झिल्ली तकनीक विकसित करने की घोषणा की है, जिससे औद्योगिक गैसों के पृथक्करण में ऊर्जा की खपत कम होगी। ये प्रक्रियाएँ वैश्विक स्तर पर कुल ऊर्जा खपत का लगभग 15% हिस्सा हैं। विश्वविद्यालय के अनुसार, यह शोध चीन और फ्रांस के शैक्षणिक साझेदारों के सहयोग से किया गया।
काओस्ट ने बताया कि यह अध्ययन 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और इसमें धातु-कार्बनिक ढाँचों (MOFs) पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो अति-संवेदनशील पदार्थ हैं और अणुओं के कुशल पृथक्करण में सहायक हैं। शोध टीम ने ऐसी झिल्ली संरचना विकसित की है, जिसमें 90% से अधिक MOFs होते हैं, साथ ही इसकी लचीलापन, मजबूती और औद्योगिक निर्माण तकनीकों के लिए उपयुक्तता भी बनी रहती है।
इसी क्रम में, शोधकर्ताओं ने एक प्रमुख तकनीकी चुनौती का समाधान किया है—एक छोटी आणविक एंकर का उपयोग कर, जो MOF की परतों को पॉलीमर श्रृंखलाओं से जोड़ती है। इससे झिल्ली का प्रदर्शन बेहतर हुआ और बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ। टीम ने सतत निर्माण तकनीक (रोल-टू-रोल) से 20 मीटर लंबी झिल्ली की रोल तैयार कर इसकी औद्योगिक उत्पादन लाइनों में एकीकरण की संभावना साबित की।
उच्च दक्षता और विविध अनुप्रयोग
काओस्ट में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक मोहम्मद अल-दावूदी ने बताया कि यह नवाचार औद्योगिक स्तर पर उन्नत झिल्लियों के व्यावहारिक निर्माण का रास्ता खोलता है और तकनीक को वास्तविक अनुप्रयोग के करीब लाता है। उन्होंने जोड़ा कि औद्योगिक पृथक्करण प्रक्रियाएँ प्रतिदिन भारी मात्रा में ऊर्जा की मांग करती हैं।
प्रयोगों में इस तकनीक ने कार्बन कैप्चर, हाइड्रोजन शुद्धिकरण और पेट्रोकेमिकल उद्योगों में प्रयुक्त प्रोपिलीन की शुद्धिकरण जैसी प्रक्रियाओं में उच्च दक्षता दिखाई। झिल्ली ने एक ही चरण में पॉलिमर निर्माण के लिए उपयुक्त शुद्धता का प्रोपिलीन तैयार किया और 150 दिन तक लगातार संचालन में अपना प्रदर्शन बनाए रखा।
मॉडलिंग के नतीजों से पता चला कि यह तकनीक पारंपरिक आसवन प्रक्रियाओं की तुलना में शुद्धिकरण लागत को 80% तक घटा सकती है। साथ ही, इसका उपयोग प्राकृतिक गैस शुद्धिकरण, हाइड्रोजन पुनर्प्राप्ति और वायुमंडल से सीधे कार्बन डाइऑक्साइड पकड़ने जैसे अन्य क्षेत्रों में भी संभव है।
गौरतलब है कि इस अध्ययन में काओस्ट, हांगकांग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ग्वांगझोउ), ग्वांगझोउ विश्वविद्यालय, त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय, मोंपेलिए विश्वविद्यालय और फ्रांसीसी राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (CNRS) के शोधकर्ताओं ने भाग लिया। इसका नेतृत्व काओस्ट के पूर्व पीएचडी छात्र प्रोफेसर शिंग चू ने किया।
