मीडिया कंपनियाँ ज्ञान को सहेजें तो बढ़ती है प्रतिस्पर्धा
डॉ. रियाद अल-फरीजी ने कहा कि मीडिया कंपनियों को हर प्रोजेक्ट को संस्थागत ज्ञान में बदलने का अवसर मिल रहा है।
मुख्य बिंदु
AIमीडिया और संचार विशेषज्ञ डॉ. रियाद बिन नासिर अल-फरीजी ने कहा है कि मीडिया प्रोडक्शन कंपनियों के पास हर प्रोजेक्ट को संस्थागत 'ज्ञान संपदा' में बदलने का अहम मौका है, जिससे यह ज्ञान कंपनी के भीतर बना रहे। उन्होंने कहा कि किसी प्रोजेक्ट का अंत, उस दौरान अर्जित अनुभव का अंत नहीं, बल्कि सीखने और आगे बढ़ने की नई शुरुआत होनी चाहिए।
फरीजी ने कहा, "मीडिया प्रोजेक्ट की असली कीमत सिर्फ उस उत्पाद में नहीं है जो कंपनी से बाहर जाता है, बल्कि उस ज्ञान में है जो प्रोजेक्ट के बाद कंपनी के भीतर रह जाता है। हर प्रोजेक्ट से दर्शकों, कार्यशैली, प्रतिभा, लागत, विचारों, सफल फैसलों और उन फैसलों के बारे में जानकारी मिलती है जिन्हें और बेहतर लिया जा सकता था।"
उन्होंने बताया कि मीडिया प्रोडक्शन इंडस्ट्री में प्रोजेक्ट आधारित कामकाज के चलते ज्ञान को सहेजना और भी जरूरी हो जाता है। टीम बदलती रहती है, क्लाइंट्स और पार्टनर अलग-अलग होते हैं, तकनीकें तेजी से बदलती हैं—ऐसे में अगर ज्ञान को संरक्षित और साझा करने की व्यवस्था न हो, तो हर नया प्रोजेक्ट लगभग शून्य से शुरू करना पड़ता है।
उन्होंने कहा, "दो कंपनियाँ एक जैसी संख्या में प्रोजेक्ट कर सकती हैं, लेकिन असली फर्क उस कंपनी में दिखेगा, जो दसवें प्रोजेक्ट के बाद पहले की तुलना में ज्यादा जानकार, सक्षम और परिपक्व हो जाती है।"
फरीजी के मुताबिक, कंपनियाँ हर प्रोजेक्ट के बाद एक व्यवस्थित और सरल प्रक्रिया अपनाकर ज्ञान का यह संचय कर सकती हैं—जैसे: हमने क्या सीखा? दर्शकों की प्रतिक्रिया क्या रही? क्या सफल रहा, कहाँ दिक्कत आई? टीम ने क्या नया सीखा? अगले प्रोजेक्ट में क्या अलग करना चाहिए?
उन्होंने बताया कि यह विचार उनकी उस रिसर्च का व्यावहारिक विस्तार है, जिसमें उन्होंने 'दृश्य और श्रव्य सामग्री की रणनीतिक योजना और सऊदी मीडिया प्रोडक्शन कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता' का अध्ययन किया था। इसमें 50 सऊदी मीडिया प्रोडक्शन कंपनियों के लीडर्स और 400 से ज्यादा सहयोगियों की राय शामिल थी।
रिसर्च में सामने आया कि कई कंपनियाँ 'सिर्फ काम पूरा करने और प्रोजेक्ट बंद करने' की मानसिकता से काम करती हैं। फरीजी मानते हैं कि आज इंडस्ट्री में बदलाव के दौर में इस सोच को बदलना जरूरी है—प्रोजेक्ट को सिर्फ एक उत्पाद मानने के बजाय, उसे संस्थागत ज्ञान और सीख का स्रोत भी मानना चाहिए।
उन्होंने कहा, "बाजार तकनीक खरीद सकता है, प्रतिभाएँ ला सकता है, प्रोडक्शन टूल्स विकसित कर सकता है, लेकिन संस्थान के भीतर जमा अनुभव को खरीदा या कॉपी करना मुश्किल है। यही ज्ञान कंपनी की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बन सकता है।"
फरीजी ने कहा कि प्रोजेक्ट से निकले ज्ञान का इस्तेमाल करने के लिए जटिल सिस्टम की जरूरत नहीं—यह काम सीखी गई बातों का दस्तावेज़ीकरण, दर्शकों की प्रतिक्रिया का विश्लेषण, सफल उपायों को सहेजना, फैसलों की समीक्षा और आगे की टीमों को यह जानकारी उपलब्ध कराने से शुरू हो सकता है।
उन्होंने जोर दिया कि मीडिया इंडस्ट्री में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच ज्ञान संचय और उससे सीखना और भी अहम हो जाता है, क्योंकि इससे संस्थान को अपने उत्पादों को बेहतर करने और बाजार व दर्शकों की बदलती जरूरतों के मुताबिक ढलने में मदद मिलती है।
फरीजी ने अंत में कहा, "हर मीडिया प्रोजेक्ट के बाद एक सवाल और पूछना चाहिए—हमने क्या हासिल किया के साथ-साथ, आज कंपनी क्या जानती और कर सकती है, जो वह इस प्रोजेक्ट से पहले नहीं जानती थी?"
