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सऊदी अरब

सऊदी अरब में चंद्रमा और थुरैया का संयोग, 'सफरी' मौसम की शुरुआत

सऊदी अरब की रात में चंद्रमा और थुरैया का दुर्लभ संयोग दिखा, जिसे 'क़रान 21' कहा जाता है। यह घटना पारंपरिक रूप से सफरी मौसम की शुरुआत मानी जाती है।

अजेल हिंदी52 मिनट पहले · 2 मिनट का पठन
सऊदी अरब में चंद्रमा और थुरैया का संयोग

मुख्य बिंदु

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सऊदी अरब के आसमान में बीती रात एक खास खगोलीय घटना देखने को मिली, जब चंद्रमा थुरैया नक्षत्र के समूह के साथ संयोग में आया। इस घटना को अरब की लोक परंपरा में 'क़रान 21' के नाम से जाना जाता है। यह घटना उन समय-चिन्हों में से है, जिनका उपयोग प्राचीन अरब मौसमों के बदलाव, कृषि और मौसम की जानकारी के लिए करते थे।

इस साल 'क़रान 21' 21 रबीउल अव्वल 1448 हिजरी, यानी 3 सितंबर 2026 को पड़ा। लोक गणना के अनुसार, यह घटना गर्मी के अंत और 'सफरी' मौसम की शुरुआत का संकेत देती है। इस दौरान रातें ठंडी और लंबी होने लगती हैं और धीरे-धीरे मौसम में ठंडक आने लगती है, जिससे पतझड़ के मौसम का आगमन करीब आता है।

लोक परंपरा में सफरी मौसम

फलक क्लब के सदस्य मोहम्मद अनाद अल-हुज़ैमी ने बताया कि 'क़रान 21' लोक परंपरा में सफरी मौसम की शुरुआत मानी जाती है, जो लगभग चार हफ्ते चलता है। इस दौरान रातें लंबी और दिन छोटे होने लगते हैं, जब तक कि पतझड़ का संतुलन नहीं आ जाता।

हुज़ैमी ने आगे कहा कि प्राचीन अरब इस समय को 'ऐलूल सैर वला तकील' कहकर पुकारते थे, जिसका अर्थ है—गर्मी कम होने और मौसम के बेहतर होने का संकेत, खासकर रात के समय। उन्होंने बताया कि बंजारे लोग सफरी की शुरुआत को रात में जमीन की ठंडक और आने वाले अधिक संतुलित मौसम की तैयारी से जोड़ते थे।

मौसमी बदलाव और संकेत

हुज़ैमी के अनुसार, इस अवधि में दिन में गर्मी और रात में ठंडक का अंतर बढ़ता है। इसी समय अनार जैसे कुछ फल पकते हैं और प्रवासी पक्षियों की गतिविधि बढ़ जाती है, साथ ही शिकारी पक्षियों की मौसमी आवाजाही भी होती है।

उन्होंने बताया कि बंजारे और किसान इस मौसम को खास महत्व देते हैं, क्योंकि यह मौसम के बदलाव का संकेत है और वे आगे तापमान में गिरावट के लिए तैयारियां शुरू कर देते हैं। 'क़रान 19' की अगली घटना मौसमों के क्रम और 'वसम' मौसम के करीब आने का संकेत देती है।

अरब परंपरा में खगोलीय संयोग

हुज़ैमी ने बताया कि चंद्रमा और थुरैया का संयोग प्राचीन काल से ही अरबों के लिए महत्वपूर्ण रहा है। वे तारों और चंद्रमा की अवस्थाओं को मौसम, कृषि और चराई के समय से जोड़ते थे। आज भी लोक खगोल विज्ञान में इसकी अहमियत बनी हुई है, हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन घटनाओं की व्याख्या अलग होती है।

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