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जेद्दा एस्ट्रोनॉमी: 'झूठा चंद्रग्रहण' नहीं, सही शब्द क्या है

जेद्दा एस्ट्रोनॉमी सोसाइटी ने कहा है कि 'झूठा चंद्रग्रहण' कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है, सही शब्द 'शबे-छाया चंद्रग्रहण' है।

अजेल हिंदी51 मिनट पहले · 2 मिनट का पठन
शबे-छाया चंद्रग्रहण पर जेद्दा एस्ट्रोनॉमी सोसाइटी

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जेद्दा एस्ट्रोनॉमी सोसाइटी ने स्पष्ट किया है कि कुछ खगोलीय लेखों में 'झूठा चंद्रग्रहण' शब्द का इस्तेमाल शबे-छाया चंद्रग्रहण के लिए किया गया है। यह नाम भाषा के लिहाज से तो समझ में आता है, क्योंकि इस तरह के चंद्रग्रहण में चांद की रोशनी में बदलाव इतना हल्का होता है कि आमतौर पर देख पाना मुश्किल होता है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से 'झूठा चंद्रग्रहण' कहना सही नहीं है।

सोसाइटी ने 'एक्स' प्लेटफॉर्म पर बताया कि सही शब्द 'शबे-छाया चंद्रग्रहण' है, क्योंकि यह इस खगोलीय घटना की प्रकृति और इसके होने की प्रक्रिया को ठीक से दर्शाता है। चंद्रग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, और पूर्णिमा के समय चंद्रमा पृथ्वी की छाया से गुजरता है। पृथ्वी की छाया में दो हिस्से होते हैं: केंद्रीय छाया और बाहरी हल्की छाया, जिसे 'शबे-छाया' कहते हैं।

सोसाइटी के अध्यक्ष इंजीनियर माजिद अबू जाहरा ने बताया कि शबे-छाया चंद्रग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पूरी तरह या आंशिक रूप से पृथ्वी की शबे-छाया से गुजरता है, लेकिन केंद्रीय छाया में नहीं जाता। इससे चांद की रोशनी में मामूली कमी आती है, जो आमतौर पर खुली आंखों से साफ नजर नहीं आती, खासकर जब घटना बहुत हल्की हो।

अबू जाहरा ने यह भी जोड़ा कि दृश्य प्रभाव हल्का होने का मतलब यह नहीं कि घटना असली नहीं है। शबे-छाया चंद्रग्रहण एक वास्तविक खगोलीय घटना है, जिसकी शुरुआत और अंत का समय सटीक रूप से मापा जा सकता है। यह चंद्रग्रहण के मुख्य प्रकारों में से एक है, जैसे आंशिक और पूर्ण चंद्रग्रहण।

उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना को 'झूठा' कहना लोगों में भ्रम पैदा कर सकता है, क्योंकि इससे लगता है कि यह असली चंद्रग्रहण नहीं है। जबकि 'शबे-छाया चंद्रग्रहण' शब्द सीधे-सीधे बताता है कि चांद किस हिस्से से गुजर रहा है और उसकी चमक में बदलाव क्यों सीमित है। उन्होंने जोर दिया कि खगोलीय विषयों में वैज्ञानिक शब्दों का सही इस्तेमाल जरूरी है, खासकर सोशल मीडिया पर जानकारी तेजी से फैलने के दौर में।

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