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सऊदी अरब

राष्ट्रीय दिवस: किंग अब्दुलअज़ीज़ की शिक्षा और विरासत को बढ़ावा देने की नीति

किंग अब्दुलअज़ीज़ ने सऊदी अरब के सांस्कृतिक विकास को राज्य निर्माण की बुनियादी नींव माना और शिक्षा, प्रकाशन व विरासत संरक्षण को प्राथमिकता दी।

अजेल हिंदी58 मिनट पहले · 4 मिनट का पठन
किंग अब्दुलअज़ीज़ के युग में सऊदी प्रकाशन और विरासत

मुख्य बिंदु

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किंग अब्दुलअज़ीज़ बिन अब्दुलरहमान अल सऊद ने सऊदी अरब के सांस्कृतिक विकास को राज्य निर्माण की बुनियादी नींव माना। 23 सितंबर 1932 को एकीकृत सऊदी अरब की घोषणा के साथ ही उन्होंने देश के शैक्षिक और सांस्कृतिक पक्ष को सशक्त बनाने का संकल्प लिया। उन्होंने पूरे देश में ज्ञान और शिक्षा के प्रसार पर जोर दिया, ताकि पारंपरिक पाठशालाओं और प्राथमिक विद्यालयों से आगे बढ़कर एक ऐसी व्यापक शैक्षिक और सांस्कृतिक संरचना तैयार की जा सके, जो देश की एकता, पहचान और भविष्य की महत्वाकांक्षाओं को मजबूत करे।

किंग अब्दुलअज़ीज़ ने बहुत जल्दी और गहराई से छपाई और प्रकाशन के क्षेत्र पर ध्यान दिया। उन्होंने सऊदी अरब के भीतर और बाहर (मिस्र, भारत, शम) सैकड़ों धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक किताबों की छपाई और प्रकाशन का खर्च खुद उठाया। उन्होंने मक्का में 'उम्म अल-क़ुरा' प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की, जिससे इन किताबों को छात्रों और विद्वानों तक पहुँचाया जा सके और इस्लामी संस्कृति को बढ़ावा मिले।

इस ज्ञान-विस्तार के तहत किताबों की छपाई और वितरण के कई उद्देश्य थे—देशवासियों में शिक्षा, संस्कृति और ज्ञान का प्रसार, अरब-इस्लामी विरासत की सेवा। किंग अब्दुलअज़ीज़ के खर्च पर मिस्र की 'अल-मनार' और भारत की प्रिंटिंग प्रेसों में कई महत्वपूर्ण किताबें छपीं, जैसे 'तारीख़ इब्न ग़नाम' और 'दीवान इब्न सहमान'। 'उम्म अल-क़ुरा' अखबार को राज्य की सरकारी पत्रिका के रूप में शुरू किया गया। बाद में शिक्षा निदेशालय के तहत कई पत्रिकाएँ और सांस्कृतिक प्रकाशन (जैसे 'अल-इस्लाह' पत्रिका) भी आए।

किंग अब्दुलअज़ीज़ के दौर में मक्का की सरकारी प्रिंटिंग प्रेस (अमीरिया) का आधुनिकीकरण हुआ। सरकार ने कई निजी प्रिंटिंग प्रेस खरीदीं और उन्हें सरकारी प्रेस में मिला दिया। कुछ कर्मचारियों को प्रिंटिंग के प्रशिक्षण के लिए मिस्र भेजा गया। मक्का में 'अल-माजिदिया' और 'अल-अरबिया' जैसी नई प्रेसें स्थापित हुईं। मदीना में 1936 में मिस्र से लाई गई एक प्रेस शुरू हुई। जेद्दा में उस समय तीन प्रेसें थीं—अरब कंपनी प्रेस, ओरिएंटल प्रेस और फतह प्रेस।

किंग अब्दुलअज़ीज़ के शासन में दो बार प्रकाशन संबंधी नियम लागू हुए—पहला 1928 में और दूसरा 1939 में। उन्होंने मक्का, जेद्दा और मदीना में प्रिंटिंग प्रेस के लिए कागज और मशीनों के आयात पर सीमा शुल्क माफ कर दिया।

किंग अब्दुलअज़ीज़ ने जिन किताबों की छपाई का आदेश दिया, उनमें धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक किताबें शामिल थीं। कुरान की व्याख्या संबंधी किताबें भी 'उम्म अल-क़ुरा' और 'सलफिया' प्रेस, मक्का के अलावा भारत, मिस्र और शम की प्रेसों में 1917 से 1954 के बीच छपीं। इस दौरान 100 से अधिक किताबें छपीं, जिनकी 1 लाख से ज्यादा प्रतियाँ बनीं। इनमें से कुछ किताबें अरबी के अलावा हिंदी, जावी जैसी अन्य भाषाओं में भी थीं और कुछ का संपादन भी हुआ।

इन किताबों में शामिल हैं: 'तारीख़ इब्न ग़नाम', 'दीवान अक़ूद अल-जवाहर' (सुलेमान बिन सहमान), 'अल-सवाएक अल-मुर्सला' (इब्न सहमान), 'अल-बिदाया वल-निहाया' (इब्न कसीर, 14 खंड), 'अल-मुग़नी' (अब्दुल्ला बिन क़ुदामा), 'अल-शरह अल-कबीर' (अब्दुलरहमान बिन क़ुदामा), 'तफसीर अल-हाफिज़' (इब्न कसीर), 'रौज़त अल-मुहिब्बीन' (इमाम इब्न क़य्यिम अल-जौज़िया), 'ज़िक्र अल-कशाफ़ा अल-इराकिया' (हज 1935), 'किताब अल-तौहीद' (इब्न खुज़ैमा, 1935), 'अल-शरीआ' (अबू बक्र बिन मुहम्मद अल-आजरी, 1950), और 'मजमूआ अल-तौहीद'।

'अल-दारा' पत्रिका में प्रकाशित अपने अध्ययन 'किंग अब्दुलअज़ीज़ द्वारा किताबों के प्रकाशन की देखभाल' में प्रोफेसर अब्दुलअज़ीज़ अल-रिफाई बताते हैं कि किंग अब्दुलअज़ीज़ के खर्च पर मिस्र में कई किताबें छपीं—जैसे 'तफसीर इब्न जरीर', 'तफसीर बगवी', 'अल-मुग़नी', 'अल-शरह अल-कबीर' और अन्य हदीस व तौहीद संबंधी किताबें।

रिफाई आगे लिखते हैं, "किंग अब्दुलअज़ीज़ का प्रयास केवल भारत और मिस्र तक सीमित नहीं था, बल्कि शम (सीरिया) तक भी फैला। उदाहरण के लिए, इमाम इब्न क़य्यिम अल-जौज़िया की 'रौज़त अल-मुहिब्बीन' किताब दमिश्क की 'अल-तरक्की' प्रेस में छपी। रिफाई ने अपनी सूची में किंग अब्दुलअज़ीज़ के खर्च पर छपी 108 विरासत पुस्तकों के नाम दिए हैं।"

किंग अब्दुलअज़ीज़ की यह ऐतिहासिक पहल सऊदी अरब की सांस्कृतिक नींव बनी और देश के सांस्कृतिक उत्थान को ऐसी दिशा दी, जिसका प्रभाव आज तक अरब, इस्लामी और वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाता है।

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