तीसरे साल भी अल-ग़दिया परिवार ने बच्चों को सिखाई 'नख़ील की फसल' की परंपरा
क़सीम क्षेत्र की पहचान में खजूर का पेड़ और उसकी खेती अहम है। अल-ग़दिया परिवार ने लगातार तीसरे साल बच्चों को खजूर तोड़ने और छांटने की पारंपरिक विधियाँ सिखाईं।
मुख्य बिंदु
AIक़सीम क्षेत्र की पहचान और कृषि परंपरा में खजूर का पेड़ अहम स्थान रखता है। यहां की पीढ़ियों के जीवन में खजूर और उसकी खेती रची-बसी है, जो अब सिर्फ़ एक फसल न रहकर सांस्कृतिक विरासत बन चुकी है, जिसे परिवार अपने बच्चों में कौशल और मूल्यों के रूप में रोपते हैं।
इसी विरासत और मेहनत की अहमियत को आगे बढ़ाते हुए, अल-ग़दिया परिवार ने लगातार तीसरे साल बच्चों को 'नख़ील की फसल' यानी खजूर तोड़ने, छांटने और पैक करने की पारंपरिक विधियाँ सिखाने की पहल की। यह आयोजन गुरुवार को ब्रेदा के नकीब मोहल्ले में अब्दुलरहमान बिन मोहम्मद अल-ग़दिया के फार्म पर हुआ, जिसमें खजूर के शौकीनों और मीडिया से जुड़े लोग भी शामिल हुए।
इस पहल में बच्चों ने खजूर की फसल से जुड़ी हर प्रक्रिया में व्यावहारिक रूप से भाग लिया—तोड़ने से लेकर छांटने, वर्गीकरण और पैकिंग तक। इसका मकसद नई पीढ़ी को क़सीम की कृषि परंपराओं से जोड़ना और खजूर के पेड़ की ऐतिहासिक, आर्थिक और सामाजिक अहमियत समझाना है।
लगातार तीसरे साल यह पहल दिखाती है कि अल-ग़दिया परिवार अपनी कृषि विरासत और अनुभव नई पीढ़ी को सौंपने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे बच्चों में कम उम्र से ही मेहनत और उत्पादन की भावना पनपती है और खजूर से जुड़ी पारंपरिक कौशल समाज की सामूहिक स्मृति और पहचान का हिस्सा बने रहते हैं।
ब्रेदा शहर खजूर और उसकी मंडियों के लिए दशकों से मशहूर है। यहां की खजूर और उससे बने उत्पाद अब दुनियाभर के बाज़ारों में पहुंच रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र की समृद्ध कृषि विरासत हर साल नई पीढ़ी के साथ आगे बढ़ रही है।

