वैज्ञानिकों ने रक्त में थक्के बनने की नई प्रक्रिया खोजी
अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में फाइब्रिनोजेन अणुओं की नई व्यवस्था सामने आई है, जिससे रक्त और श्वसन विकारों के उपचार में मदद मिल सकती है।
मुख्य बिंदु
AIब्रिटेन, स्वीडन और फ्रांस के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा की गई एक संयुक्त अध्ययन में रक्त के थक्के बनने की एक नई प्रक्रिया का पता चला है, जो पहले माने जा रहे फाइब्रिनोजेन प्रोटीन अणुओं की व्यवस्था से अलग है। यह प्रोटीन रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभाता है।
फ्रांस के ग्रोनोबल शहर स्थित लाउ-लैंगविन संस्थान में हुई प्रयोगों में पाया गया कि 'फाइब्रिनोजेन' अणु जब हवा के संपर्क में आते हैं तो वे एक के ऊपर एक क्षैतिज परतों में व्यवस्थित होते हैं, ठीक वैसे जैसे कागज की गड्डी, न कि एक झुकी हुई परत में जैसा कि दशकों से माना जाता रहा है।
चिकित्सा में संभावनाएँ
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये नतीजे रक्त के थक्के बनने संबंधी विकारों, जैसे हीमोफीलिया, के इलाज के नए तरीके विकसित करने में मदद कर सकते हैं। साथ ही, डायबिटीज़ के मरीजों के लिए ग्लूकोज की निगरानी के अधिक प्रभावी साधन भी विकसित किए जा सकते हैं।
इसी संदर्भ में, ये निष्कर्ष तीव्र श्वसन संकट सिंड्रोम के इलाज में भी अहम हो सकते हैं, क्योंकि फेफड़ों में सूजन के कारण 'फाइब्रिनोजेन' के वायुकोशिकाओं में रिसाव से थक्के बन सकते हैं और सांस लेने में गंभीर समस्या हो सकती है।
